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नारी के रूप

नारी के रूप बिटिया रुप लक्ष्मी का, घर आंगन की मान। पिता की राज दुलारी, भाई की अरमान। पत्नी में सावित्री है, बसते पति में प्राण। सदा सलामत रहे पति, मांगे यही वरदान। बहू बनके जो आई, रखी सबका ध्यान। सुबह से भागा दौड़ी, तनिक नहीं आराम। दुनियां जिसमें टिकी है, मां है उसका...

अक्स वही दिखता है आज

अक्स वही दिखता है आज, सिसकियां सुनाई देती है, महलो की दीवारों से। कितनी कलियाँ जल गई, हवस के अंगारों से। रक्त रंजित है इतिहास, शैतानों के अत्याचारों से। किस्से उड़ के आते है, जमीदारों की गलियारों से। दिखाई देतें हैं चेहरे कई, झरोखों से द्वारों से। दास्तां कोई पढ़ा...

आज फेर तोर सुरता आगी सुलगावत हे

  आज फेर तोर सुरता आगी सुलगावत हे आज फेर तोर सुरता आगी सुलगावत हे बैरी आंखी ले तरतर आंसू बोहावत हे काबर देखाये तैं सपना मया पिरित के तोर मया ह मोर सुध बुध बिसरावत हे दिन तो बित्तथे जस तस संगी साथी संग रथिया जाग के, आंखी मा पहावत हे पथरा के दुनियां मा, काबर होथे...

मंहगाई (मनहरण घनाक्षरी छंद)

मंहगाई चारों ओर छाई देखों , घिर कर आई देखों कलुटी मंहगाई तो, बड़ी दुखदाई है। कौन यहां हंस रहा, कौन यहां फस रहा बढ़ती महंगाई तो, सबको रुलाई है। अब कोन आश धरे, डुबती क्यों सांस धरे नेताओं ने कब यहां, कहके निभाई है। बड़े बोल बोल रहा, पोल सारे खोल रहा मन मानी कर कर,...

हरियाली (मनहरण घनाक्षरी छंद)

हरियाली हरि हरि हरियाली, जल कर हुई काली देखों दम घुट रहा, वीराने उजाड़ में। जी रहें हैं मर मर, फेफड़े में विष भर सब यहां तुले हुए, प्रकृति बिगाड़ में। पौधा कोई बोता नहीं, पाप यहां धोता नहीं बदल रहीं धरती, धुएँ के पहाड़ में। बड़े बड़े कारखाने, समृद्धि के है पैमाने पेड़...
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