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रूपमाला: तुम किरण थी

तुम किरण थी मैं अँधेरा, हो सका कब मेल। खेल कर हर बार हारा, प्यार का ये खेल।। नैन उलझे और सपने , बुन सके हम लोग। आज भी लगता नही ये, था महज संजोग।। -मथुरा प्रसाद...

रूपमाला: मैं जला

मैं जला जलता रहा हूँ, रात भर अनजान। आप रोटी सेंक अपना, चल दिये श्रीमान।। मैं सहूँगा हर सितम को , मुस्कुराकर यार। आप ने मेरी मुहब्बत, दी बना बाजार।। -मथुरा प्रसाद...

राम जैसा राम जग में, दूसरा ना और

राम जैसा राम जग में, दूसरा ना और (रूपमाला छंद) राम जैसा राम जग में, दूसरा ना और । देश भारत देश जैसा, दूसरा ना ठौर ।। मानते तो है जहाँ पर, राम है अवधेश । किन्तु खुलकर बोलते ना, वाह रे ये देश ।। राम का वनवास कबतक, पूछते हैं लोग । देश है आजाद फिर भी, साध्य ना यह रोग ।।...

जांघ अपने काट के हम, बनावत हन साख

धर्म अउ संस्कार मा तो, करे शंका आज ।आंग्ल शिक्षा नीति पाले, ओखरे ये राज ।।देख शिक्षा नीति अइसन, आय बड़का रोग ।दासता हे आज जिंदा, देश भोगत भोग ।।देख कतका देश हावे, विश्व मा घनघोर ।जेन कहिथे जांघ ठोके, धर्म आवय मोर ।।लाख मुस्लिम देश हावय, लाख क्रिश्चन देश ।धर्म शिक्षा...
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