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दाई के दूध म अमृत होथे

आजकाल के लइका मन के, उमर बीमारी म पहावत हे, काबर ! आजकाल के दाई लइका ल अपन दूधे नई पियावत हे, अरे! देवता घलो मन, महतारी के दूध पिये बर, अपन जीव ल चुरोथे, काबर! दाई के दूध म अमृत होथे, आजकाल के दाई मन ल, बस अपन फिगर के चिंता हे, अरे! द्वापर त्रेता के दाई मन, फिगर के...

राजनीति हर दाद होगे

भले कोनो पार्टी म दम नई हे, फेर रैली म जवईया मन के टेस, विधायक ले कम नई हे, हाथ म पार्टी के झंडा अउ, मुँह म बीरोपान हे, पागे हे फोकटहा फटफटी, तहाँ देखावत अपन शान हे, दूदी सौ के रोजी म, नारा लगईया के भरमार हे, राजनीति के चिखला, सादा कुरथा के व्यापार हे, वर्तमान के...

बाँचगे खाली लोटा

बिन पेंदी के लोटा खेलय, राजनीति के गोंटा, अठन्नी बनगे खर-खर भईया, सिक्का होगे खोटा, जेने बनथे संगी भईया, उही मसकथे टोंटा, आस जम्मो छरियागे भईया, छरियागे सबके पोटा, खदर-बदर हे विचार ह भईया, जुच्छा जाही नोटा, दुआ-भेदी के अंगरा हे भईया, लूट डरिस जी कोटा, काजू-मेवा खादी...

ज्वलंत समस्या

देशहित के चलते देखो, हो रहे कई काम, फिर भी आतुर राजनीति, करने को बदनाम, व्यर्थ बातों में धरने देते, मुद्दे सबके आडम्बर, ज्वलंत समस्या पड़ी हुई है, अकुलाती सी जर्जर।। -मनोज कुमार...

खुद में राम खोजता हूँ

सूर-तुलसी बन नहीं पाया, चाहता हूँ इंसान बनूँ, गुमनामी में जो हैं जीते, उनकी मैं पहचान बनूँ। खुशियों का भंडार अगर हो, बाँटूँ सबको बारम्बार, झुग्गी में कोई सपना देखे, कर पाऊँ उसको साकार। देवालय है मन के भीतर, देव वही पर देखा है, नित-नित प्रेरित करता रहता, कर्म प्रधान ही...
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