Select Page

रूपमाला: तुम किरण थी

तुम किरण थी मैं अँधेरा, हो सका कब मेल। खेल कर हर बार हारा, प्यार का ये खेल।। नैन उलझे और सपने , बुन सके हम लोग। आज भी लगता नही ये, था महज संजोग।। -मथुरा प्रसाद...

रूपमाला: मैं जला

मैं जला जलता रहा हूँ, रात भर अनजान। आप रोटी सेंक अपना, चल दिये श्रीमान।। मैं सहूँगा हर सितम को , मुस्कुराकर यार। आप ने मेरी मुहब्बत, दी बना बाजार।। -मथुरा प्रसाद...

अमृत ध्वनि: नेता आही

नेता आही गाँव मा, अब तो भाई रोज। आवत चुनाव तीर हे, गली गली हे खोज। गली गली हे , खोज हमर अब, करही वादा। उही जीतही , जूठ बोलही , जे हा जादा। बैर बाँट के,गली गली मा , रार मताही। अब स्वारथ बर, रोज गाँव मा , नेता आही। -मथुरा प्रसाद...

अमृत ध्वनि: नारी ममता रूप।

नारी ममता रूप हे, मया पिरित के खान। घर के सुख बर रात दिन, देथे तन मन प्रान।। देथे तन मन , प्राण लगा के, सेवा करथे। अपने सहिथेे , अउ घर भर के, पीरा हरथे।। दाई बेटी, बहिनी पत्नी, अउ सँगवारी। अलग अलग हे, नाँव फेर हे , देवी नारी।। -मथुरा प्रसाद...

अमृत ध्वनि: चमचा बन के खास।

गरब करत हे आज रे, कुकुर सहीं बिस्वास। मनखे मन इतरात हे, चमचा बनके खास।। चमचा बनके, बाँधय पट्टा, जीभ लमावय। ये पाछु घुमय ,फोकट पावय , नगते खावय।। अपन ददा के, छोड़ आन के,नाँव घरत हे। सरम लाज नइ, लागय का जी, गरब करत हे।। -मथुरा प्रसाद...
error: