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फिर फागुन आया

फिर फागुन आया है (बरैवा छंद) है तन मन बौराया,भीगा अंग। फिर फागुन आया है,लेकर रंग। कलरव करते हैं खग,मगन अपार। बहती है रह रह कर,मस्त बयार। ना गरमी ना जाड़ा,सम है ताप। मौसम इतना अच्छा,मिटा संताप। कोयल कूके कुहु कुहु,देखो आम। बौराई है फिर से,हर इक शाम। मधुबन लागे आँगन,हर...

गाँव

गाँव  (बरवै छन्द) सुग्घर लागत हावय,हमरो गाँव। बर पीपर के ठंडा,पावन छाँव।। नदिया नरवा बोहत,हावय धार। हरियर हरियर दिखथे,खेती खार।। कोयल कुहके कउँवा,करथे काँव। सुत उठ सब धरती के,परथें पाँव।। करथें सबो किसानी,पाथें धान। मारय नइ जी कोनो,शेखी शान।। महिनत के बदला मा,पाथें...
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