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मंहगाई (मनहरण घनाक्षरी छंद)

मंहगाई चारों ओर छाई देखों , घिर कर आई देखों कलुटी मंहगाई तो, बड़ी दुखदाई है। कौन यहां हंस रहा, कौन यहां फस रहा बढ़ती महंगाई तो, सबको रुलाई है। अब कोन आश धरे, डुबती क्यों सांस धरे नेताओं ने कब यहां, कहके निभाई है। बड़े बोल बोल रहा, पोल सारे खोल रहा मन मानी कर कर,...

हरियाली (मनहरण घनाक्षरी छंद)

हरियाली हरि हरि हरियाली, जल कर हुई काली देखों दम घुट रहा, वीराने उजाड़ में। जी रहें हैं मर मर, फेफड़े में विष भर सब यहां तुले हुए, प्रकृति बिगाड़ में। पौधा कोई बोता नहीं, पाप यहां धोता नहीं बदल रहीं धरती, धुएँ के पहाड़ में। बड़े बड़े कारखाने, समृद्धि के है पैमाने पेड़...

चंदा देख लजाय

चंदा देख लजाय ( रूप घनाक्षरी )   खन खन खन खन, चूरी निक खनकय , माथा बिंदी चमकय , चंदा देखत लजाय । मेंहदी हँथेरी रचे, गर हार बने फभे, कनिहा मा करधन, हावै गहना लदाय । होंठ लगे मुँहरंगी , कोरे गाँथे करे कंघी , फूँदरा झूलय बेनी, पाँव माँहुर रचाय । गोरी मोटियारी हावै,...

  ममहाबे

  ममहाबे (जलहरण घनाक्षरी)   ममहाबे चारों खूँट, होही भाई तोरो पूछ, जिनगी सँवर जाही, उदबत्ती कस खप । पक्का बन जबान के, संग चल ईमान के, काबर कच्चा कान के, छोंड़ देना लपझप । मिहनत कर संगी, नइ राहै कभू तंगी, उदाबादी झन कर, इही आय बड़े तप। भुईयाँ ल सिंगार के, पसीना ल ओगार के,...

 नवटप्पा के मार

 नवटप्पा के मार (मनहरण घनाक्षरी)   ताते तात झाँझ झोला , लेसावत हावै चोला, जेठ लगे नवटप्पा ,भारी इँतरात हे। सुक्खा कुआँ तरिया हे, मरे मरे झिरिया हे, बोरिंग हा ठाढ़े ठाढ़े , रोज्जे दुबरात हे। रोवत हें रुखराई, नदिया के मुँह झाँई, धरती के देख देख, जीवरा करलात हे। ईंटा भट्ठी...
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