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दाई ददा के मया

कहिनी-                             दाई ददा के मया पत्नि पति से (रोवत रोवत) – देख न जी चार साल हो गए हमर बिहाव ल फेर एक्को झन हमर लोग लइका नई हे, भगवान ह हमन ल काबर सोझ नजर ले नई देखत हे, कोन जनी का पाप करे हन हमन। पति – तैं संसो झन कर रुखमनी भगवान ह हमरो...

नान्हे कहिनी-चढ़े बुखार

एक,…. दू, ……तीन ….., चवथैया बस घलो छूटगे ।  फेर सिवनाथ हा ब्इठेच रहिगे ।  का करय बिचारा !  देह हा अँगरा कस तीपत राँहय । लेहे देहे म राईपुर ले सिमगा तक आईस फेर बस बदले बर सिमगा के होटल म ब्ईठ गे ।  मन ता कहय अब आही तेन गाडी म जरुर जाहू फेर तन हा...

चार बेटा राम के कौडी के ना काम के

छोहीहा नरवा के  दुनो कोती दु ठन पारा नरवरगढ़ के । बुड़ती म जुन्ना पारा अउ उत्ती मा नवा पारा । जुन्नापारा मा गांव के जुन्ना बासिंदा मन के डेरा अऊ नवापारा मा पर गांव ले आये नवा मनखे मन के कुरिया । गांव के दुनो कोती मंदिर देवालय के ष्संख घंटा के सुघ्घर ध्वनि संझा बिहनिया...

मुर्रा के लाडू

              घातेच दिन के बात आवय ओ जमाना म आज काल कस टीवी, सिनेमा कस ताम झाम नई रहिस । गांव के सीयान मन ह गांव के बीच बइठ के आनी बानी कथा किस्सा सुनावय ।  इही कहानीमन ल सुनके घर के ममादाई, ककादाई मन अपन अपन नाती पोता ल कहानी सुना सुना के मनावाय लईका मन घला रात रात...
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