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एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे

(श्री गोपालदास नीरज  की कविता‘‘जीवन नही मरा करता‘‘ से अभिप्रेरित)लुका-लुका के रोवइयामन, कान खोल के सुन लौ रे ।फोकट-फोकट आँसु झरइया, बात मोर ये गुन लौ रे ।।हार-जीत सिक्का कस पहलू, राखे जीवन हर जोरे ।एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।सपना आखिर कहिथें काला,...

गांव ले लहुटत-लहुटत

श्री केदारनाथ अग्रवाल के कविता ‘चन्द्रगहना से लौटती बेर‘ के आधार मा छत्तीसगढ़ी कविता -‘‘गांव ले लहुटत-लहुटत‘देख आयेंव मैं गांवअब देखत हँव अपन चारो कोतीखेत के मेढ़ मा बइठे-बइठेबीता भर बठवा चनामुड़ मा पागा बांधेछोटे-छोटे गुलाबी फूल केसजे-धजे खड़े हे ।संगे-संगे खड़े हेबीच-बीच...

सांझ

संझा (मूल रचना-‘संध्या सुंदरी‘-श्री सूर्यकांत त्रिपाढी निराला) .बेरा ऐती न ओती बेरा बुडत रहीस, करिया रंग बादर ले सुघ्घर उतरत रहिस, संझा वो संझा, सुघ्घर परी असन, धीरे धीरे धीरे…………… बुड़ती म, चुलबुलाहट के अता पता नईये ओखर दुनो होट ले टपकत...
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