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क्यों टांग अड़ाते हैं दूसरों के फटेले में

खुद से बात करते हैं चलो अकेले में
क्यों उलझें रहते हैं अक्सर झमेले में

ना आंखों में निंद ना दिल में करार
जुबां भी सामील है कड़वे करेले में

क्या पाना और क्या खोना है दोस्तों
गोबर ही मिलता है स्वार्थ के तबेले में

अपने काम से काम क्यों रखते नहीं
दुनियां घुम आतें हैं नुक्कड़ के ठेले में

हर जगह खिंचा तानी हैं बेवजह की
क्यों टांग अड़ाते हैं दूसरों के फटेले में

सत्यधर बान्धे
गंजपारा बेमेतरा

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