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जिनगी के पैडगरी

जिनगी के पैडगरी म संगी,
ऊबड़ खाबड़ रेंगे ल परही।
ऊँच निच अऊ डबरा डिलवा,
गिर गिर खुद संभलना परही।।

सुख के साथी बँहुते मिलही,
दुःख म दुरिहा छिदबिद होही।
तोर करम के रोना जँहुरिया,
अपन आँखि म कोन रोही।।
करम के दीया तोर अइसे बार,
सबो जगह ओला बरे ल परही।
जिनगी के……….रेंगे ल परही।।

झन सोच तैं, झन बिचार संगी,
जऊन होना हे ओही होही ।
उप्पर वाले तोर जिनगी म एकदिन,
सुख के बिजहा जरूर बोही ।
दुःख के आँसु कहूँ रोवत रइबो,
त फेर धीरज ल कोन धरही।
जिनगी के……….रेंगे ल परही।।

भरम के बैरी नदिया म,
मोह के डोंगा खेवत हच।
छन्नी म तैं दूध दूहे अऊ,
करम ल दोष देवत हच।
अपन करम के भुगतना संगी,
हमला खुद भुगतना परही।
जिनगी के……….रेंगे ल परही।।

का होगे तोर आघु म आज,
बिपत के अँधरी छाये हे।
कतको मनखे भरे परे हे,
जऊन दर दर ठोकर खाये हे।
बाँध के रखबे मन ल तँय हर,
त अँजोर ओला करे ल परही।
जिनगी के……….रेंगे ल परही।।

नागेश कश्यप

कुँवागाँव मुंगेली छ.ग.

7828431744

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