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(मदनहर दंडक)

जय-जय रघुराई, रहव सहाई, तैं सुखदाई जगत कहै, मन भगत लहै ।
गुण तोरे गावय, तेन अघावय, सब सुख पावय दुख न सहै, जब चरण गहै ।।
सब मरम लखावत, धरम बतावत, चरित देखावत पाठ गढे़, ये जगत कढ़े ।
जग रिश्तादारी, करत सुरारी, जगत सम्हारी जगत पढ़े, सब आघु बढ़े ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

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