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      //गीत वसंती ~ सार छंद में//
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बाँध बोरिया बिस्तर अपना, दुबक चला जड़काला।
अब वसंत आया अलबेला, दिखता नया निराला।

बाग बगीचे कानन झुरमुट, बरबस ही बौराए।
यौवन व्यापक यत्र-तत्र तब, राग बसंती गाए।
कामदेव युवराज स्वागतम्, स्वीकारो वरमाला।
अब वसंत आया अलबेला, दिखता नया निराला।-1

नई कोंपलें नवल यौवना, खिलखिल खिलती कलियाँ।
भाँति-भाँति मकरंद फूल पर, झूमें भ्रमर तितलियाँ।
रस पीकर बहके फिरते, जैसे मय का प्याला।
अब वसंत आया अलबेला, दिखता नया निराला।-2

आम्रमंजरी अरहर अलसी, अलि अरण्य अगुवाई।
सरसों सेंमल टेसू गेहूँ, सबमें नव तरुणाई।
महक-महक मद महुआ महके, मादकता मतवाला।
अब वसंत आया अलबेला, दिखता नया निराला।-3
बाँध बोरिया बिस्तर अपना, दुबक चला जड़काला।
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*कन्हैया साहू “अमित”*
शिक्षक~भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055
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