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गरीबी

यहां हर कोई गरीब, हर कोई अमीर है
बस हाथों में अपनी उलझी हुई लकीर है

देने वाले ने तो दिए, सब को दो ही हाथ
कोई तकदीर से राजा तो कोई फ़कीर है

हौसलों से भरो, उड़ान हर ख्वाबों की
ईर्ष्या द्वेष तो सीने में चुभते हुए तीर है

नश्वर दुनियां में हर सय मिट जानी है
जो जान गया वही ज्ञानी , संत, कबीर है

लिखने को तो लिख दूं, दर्द मुफलिसी के
पर इन लफ्जों से, दिल मेरा गंभीर है

सत्यधर बान्धे

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