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फागुन आगे, मन बउरागे

फागुन आगे, मन बउरागे
फूल गे आमा म मउंर।
राधा कृसना रास रचावय
देख के बनेअस ठउंर।

परसा फूलगे, सरसो फूलगे
माते ओंहारी म खार।
देखव कइसन धरती आज,
सुग्घर करे हवय सिंगार।

कोयली कुकय, गावय गीत
सुनके कनिहा मारे लोच।
पड़की मैना बइठे डार म
देखव मिलाके चोंच म चोंच।

ठिनके नंगाड़ा, उड़त हे फाग
नाचत हे मन झकझोर।
लाली गुलाली रंग उड़त हे
टिहके डंडा नचइया चारो ओर।

लाली गाल, गुलाबी होंठ
चढ़गे मया के का रंग।
देखइया मन देखत रहिगे
जब खेलय गोरी फाग संगे संग।

सत्यधर बान्धे
गंजपारा बेमेतरा

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