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देश होत है लोग से, होत देश से लोग ।
देश भक्ति निर्लिप्त है, नहीँ चुनावी भोग ।।

गर्व जिसे ना देश पर, करते खड़ा सवाल ।
जिसके बल पर देश में , दिखते नित्य बवाल ।।

वक्त यही बदलाव का, बनना चौकीदार ।
नंगे-लुच्चे इस समय, पहुँचे मत दरबार ।।

लोकतंत्र में मतदाता ही, असली चौकीदार ।
स्वार्थी लोभी नेताओं को, करे बेरोजगार ।।

देख घोषणा पत्र यह, रिश्वत से ना भिन्न ।
मुफ्तखोर सब लोग हैं, जो इससे ना खिन्न ।।

मुफ्त बांटना क्यों भला, हमें दीजिये काम ।
मैं भी तो जीवित रहूँ, रहे आत्म सम्मान ।।

लोभ मोह को छोड़कर, करना है मतदान ।
देश शक्तिशाली बने, बढ़े आत्म सम्मान ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

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