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सुई रेत में गुम हो गई , सत्य चुनावी घोष में,
कौन कहां अब ढूँढे उसे, बुने हुये गुण-दोष में ।

भाग्य विधाता बनने चले, बैठ ऊँट की पीठ पर,
चना-चबेना खग-मृग हेतु, छिड़क रहें उद्घोष में ।

जाल बिछाये छलबल लिये, दाने डाले बोल के
देख प्रतिद्वंदी वह सजग, लाल दिखे है रोष में ।

बने आदमी यदि आदमी, अपने को पहचान कर
रत्न ढूँढ लेवे सिंधु से, मिथक तोड़ संतोष में ।

लोभ मोह के झाँसा फँसे, अपने को ही भूल कर
पत्थर पाकर प्रसन्न रहे, अवसर के इस कोष में ।।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

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