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रमेशकुमार सिंह चौहान

छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में श्री रमेशकुमार सिंह चौहान एक परिचित नाम है । छत्तीसगढ़ी के राजभाषा बनने के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करने की इच्छा से आपके द्वारा छत्तीसगढ़ी में छंद शिल्प पर ना केवल स्वयं काव्य रचना करना अपितु नवोदित रचनाकारों को छंद की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया जाना उल्लेखनिय है । आपने अपनी रचनाओ में मूल छत्तीसगढ़ी शब्द में छत्तीसगढ़िया ग्रामिण संस्कृति को उकरने का सफल प्रयास किया है ।
आपका जन्म 24 जुलाई 1972 को एक अत्यंत साधारण परिवार में पिता श्री मेलन सिंह चौहान एवं माता श्रीमती रामकली चौहान क यहां हुआ ।  आपके पिता एक शिक्षक थे, किन्तु अल्पवेतनभोगी होने के कारण पूरा परिवार आर्थिक संकटो से जूझता रहा । आप अभी चौथी-पाँचवी कक्षा में पढ़ ही रहे थे कि आपके पिताजी का मानसिक स्वास्थ बिगड़ गया । अब आपका ज्यादातर समय अपने पिता के देख-रेख में ही चला जाता ।  अपने पढ़ाई को छोड़कर अपने पिताजी को उनके स्कूल तक लाने लेजाने का दायित्व का निर्वहन करते क्योंकि इस स्थिति में आपके पिता आपके बिना कहीं नहीं जाते थे ।  इसी समय आपके पिताजी का 4 माह का वेतन रूक गया । घर का एक मात्र एक एकड़ की जमीन भी जाती रही । घर में खाने के लाले पड़ गये । आपके माताजी मानसिक अस्वस्थ हाने के बाद भी आपके पिता को साथ लेकर खंती कोढ़ने (खेतो में मिट्टी खुदाई करने) जाती, इस बीच घर का चौका-चूल्हा और छोटे भाइयों देख-रेख का दायित्व आपके ऊपर था । आपके पिताजी के मानसिक स्वास्थ में उतार-चढ़ाव चलता रहा । इन झंझावातों से जुझते हुये आपने गणित विषय लेकर बी.एस.सी में दाखिला लिया । बी.एस.सी प्रथम वर्ष के परीक्षा के पूर्वसंध्या पर मित्र के साथ सायकल से जाते समय सायकल से गिरने पर आपके दायें हाथ की कलाई फेक्चर हो गया । रात तक उस हाथ पर प्लास्टर चढ़ गया जिस हाथ से लिख कर अगली सुबह परीक्षा देनी थी । आप रात भर हाथ दर्द से अधिक इस बात पर रोते रह गये कि अगली सुबह आप परीक्षा नही दे पायेंगे । आपने अपने आत्मबल एवं चिकित्सक की प्रेरणा से ओ करने का ठान लिये जो लगभग असंभव था।  सुबह 7 बजे परीक्षा प्रारंभ होनी थी ।  आप परीक्षा केन्द्र बेमेतरा से 25 किमी दूर अपने गांव नवागढ़ में थे।  आप अपने छोटे भाई को कह कर सायकल में बिठाकर बेमेतरा पहुँचाने का निवेदन किया आपके छोटे भाई भी आपके स्नेह में आपके उत्साह के साथ हो लिये और दोनों भाई प्रातः 4 बजे सायकल से बेमेतरा के लिये निकल लिये जैसे-तैसे लभगभग 6.30 बजे महाविद्यालय परिसर में पहुँचे । आपके खुशियों का ठीकाना ना रहा ।  परीक्षा में बैठ पाने की खुशी से हाथ का दर्द जैसे जाता रहा । परीक्षा में लेखक रखने के विकल्प होने के बाद भी स्वयं उसी हाथों से परीक्षा दिये और सफल हुये ।  अंतिम वर्ष के परीक्षा के लगभग एक सप्ताह पूर्व आपके पिताजी का मानसिक स्वास्थ कुछ ज्यादा खराब हो गया । मनोचिकित्सालय में भर्ती कराना पड़ा । पांच-छः दिन उपचार के पश्चात छुट्टी दिया गया । दूसरे दिन से आपकी परीक्षाएं थीं । विभिन्न रूकावटों को पार करते हुय आपने बी.एस.सी. (गणित) की परीक्षा उत्तीर्ण कर लीं ।  जिस समय आपने ये परीक्षा उत्तीर्ण की उस समय आप गांव के गीने-चुने बी.एस.सी. उत्तीर्ण करने वालों में थे ।
काव्य सृजन का बीजाकुंर आप में बाल्यकाल से हो गया था । जब आप दसवी कक्षा के विद्यार्थी थे उसी समय कविता, कहानी, लेख लिखने लग गये थे । 1989 में लिपिबद्ध प्रथम कविता ‘‘प्रेम‘‘ है, किन्तु यह प्रेम अलाप  ना होकर आव्हान है, इस कविता में आपने भारतवासियों को प्रेम से रहने का आव्हान किया है ।  इसी समय पहला छंद मय कविता ‘बरखा‘ दोहा-चौपाई में लिखने का प्रयास है । आपके इस बाल्यकाल की पाण्डुलिपि आज भी संरक्षित है जिसमें कुछ कवितायें, कुछ कहानियां एवं ‘नारी अबला नहीं है‘‘ विषय पर आलेख हैं ।  शा. पं. जवाहर लाल नेहरू कला एवं विज्ञान महाविद्यलय बेमेतरा के वाषि्र्ाक पत्रिका ‘प्रेरणा‘ 1993 में ‘‘विवेकानंद-एक परिव्राजक सन्यासी‘‘ शीर्षक से प्रकाशित आलेख आपका प्रथम प्रकाशित रचना है । महाविद्यालयीन शिक्षा उपरांत आजीविका के फेर में लेखन गति बहुत ही मंथर रही । इस बीच विभिन्न मंच संचालनों के कुछ मौलिक पंक्ति लिखते रहे किंतु पाण्डुलिपि संरक्षित नहीं रख पाये ।
सन् 2010 के बाद ही लेखन में कुछ गति आई । 2012 में प्रकाशित कृति ‘‘सत्यनारायण कथामृत‘‘ आपकी पहिली प्रकाशित कृति है, जिसमें आपने सत्यनाराण कथा, जो संस्कृत में है का हिन्दी में छंदबद्ध अनुवाद किया है । इसके बाद 2014 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह ‘सुरता‘ (छत्तीसगढ़ी कविता के कोठी) आपके प्रथम छत्तीसगढ़ी कृति है । सुरता में आपने मुख्य रूप से तुकांत कवितायें प्रस्तुत की हैं, किन्तु इसके साथ-साथ कुछ छंदबद्ध कवितायें, छत्तीसगढ़ी में हाइकू, तांका के अतिरिक्त सुप्रसिद्धकवि श्री हरिवंश राय बच्चन के ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती का छत्तीसगढ़ी अनुवाद भी उल्लेखनीय हैं । छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनय पाठक ‘सुरता‘ में भूमिका देते हुये लिखते हैं कि-‘‘श्री रमेशकुमार सिंह चौहान का प्रस्तुत काव्य संग्रह ‘सुरता‘ बालपन की स्मृति का संचरण है जिसमें छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति और लोकजीवन का स्पंदन है । अध्यात्म और संस्कृतिपर आधृत इसकी अधिकांश कविताएं जीवन सत्य को ही सामदृत करती है ।  कबीर का प्रभाव इनकी कविताओं में आंचलिक निर्वाह के साथ निष्पन्न है ।‘‘
‘‘श्रीराम रक्षा चालीसा‘‘ आपके हिन्दी में प्रकाशित अगली कृति है, जिसमें आपने संस्कृत के श्रीरामरक्षास्त्रोत का 40 चौपाईयों में छंदानुवाद किया है । इसी कृति में श्रीमदृभागवत के अवतार कथा के चौबीस अवतार को सवैया छंद में प्रस्तुत किया है ।
2016 में आपके दो कृतियां प्रकाशित हुई । पूर्वाद्ध में ‘आँखी रहिके अंधरा‘‘ (छत्तीसगढ़ी कुण्डलियां के कोठी) प्रकाशित हुई, जो ज्ञात स्रोतों के अनुसार छत्तीसगढ़ी में कुण्डलियां छंद का प्रथम प्रकाशित संग्रह है । इस संबंध में डॉ. विनय पाठक अपने भूमिका में कहते हैं कि-‘‘छत्तीसगढ़ी मा तो विप्रजी ले लेके कतको कवि मन कुंडलियां छंद मा छिटपुट कविता लिखें हें फेर दलितजी के पाछू ए डहर चेत करइया अउ पोगरी संग्रह देवइया छत्तीसगढ़ी कुंडलियां के कोठी बनइया चौहानजी ह अपन चिन्हारी बना ले हे ।‘‘ ‘आँखी रहिके अंधरा‘ के विषय वस्तु कथ्य पर श्री कृष्ण कुमार भट्ट ‘पथिक‘ वरिष्ठ साहित्याकार लिखते हैं-‘‘आँखी रहिके अंधरा‘ में रमेशकुमार सिंह चौहान ने ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया‘‘ में ‘सबले बढ़िया‘ छत्तीसगढ़िया के उन लोगों पर कवितायें रची हैं जो चुप शोषण का शिकार हो रहे हैं ।‘‘
2016 के उत्तरार्द्ध में आपकी प्रकाशित कृति ‘दोहा के रंग‘ अबतक आपके सर्वाधिक चर्चित कृति है । यह कृति आपके दोहा संग्रह होने के साथ-साथ दोहा का व्याकरण भी है जिसमें आपने छंद का परिचय देते दोहा छंद के बारिकियों को सविस्तार से उदघृत किया है । दोहा छंद के विधान, दोहा छंद के प्रकार के साथ-साथ दोहा छंदों पर विभिन्न प्रयोग जैसे दोहा सिंहावलोकनी, दोहा-मुक्तक, दोहा-गीत, दोहा-ददरिया प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । इस संबंध में जनकवि छंदकार कोदूराम दलित के सुपुत्र छंदविद श्री अरूण कुमार निगमजी लिखते हैं-‘‘दोहा के रंग‘‘ मा दोहा छंद के बारे में कई तरह के जानकारी दे गे हे । दोहा काला कहिथे, दोहा के विधान का हे, दोहा कतिक किसिम के होथे, दोहा कइसे लिखे जाथे, के संगेसंग ये किताब मा छन्द लिखे बर स्वर-व्यंजन लघु-गुरू के जानकारी, मात्रा गिने के नियम, गेयता बर नियम, तुकान्त के नियम जइसे मूलभूत जानकारी विस्तार से उदाहरण सहित समझाए गे हे ।‘‘ श्री निगमजी आघू लिखते दोहा के रंग मा जउन विषय ऊपर रमेश चौहानजी दोहा लिखे हें वोला देख के मानी दंग रहिगेंव, आपमन छत्तीसगढ़ के परम्परा, संस्कार, संस्कृति के अलावा भी विषय ला चुने हव ।  नदिया, तरिया, जंगल-झाड़ी, महतारी, भुइंयाँ के महिमा, खेत-खलिहान जइसन विषय मा तो सब लिखथें, फेर ये किताब मा जउन विषय ले गे हो बिल्कुलेच नवा लागिस ।‘‘
2018 में आपके प्रकाशित कृति ‘छंद चालीसा‘‘ में विभिन्न 40 छंदों पर रचनायें हैं । इस कृति की एक विशेष बात यह है सभी 40 छंदों का उसी छंद विधान में काव्यात्मक परिभाषा प्रस्तुत किया गया है । इस कृति के भूमिका में श्री अरूण निगमजी लिखते है-‘‘ये किताब हर कई मायने मा विषेष बन गे हे ।  एमा चालीसों किसम के छन्द के विधान संबंधित छन्द मा दिए गए हे । येहर अपन आप मा बहुते कठिन काम आय । सिरिफ पंडित जगन्नाथ प्रसाद भानु के छन्द प्रभाकर मा अइसने हर छन्द के विधान,  संबंधित छन्द मा देखे मा आये हे  । ये किताब के एक अउ विषेषता हे कि एमा छन्द सीखे अउ लिखे बर जरूरी व्याकरण के जानकारी विस्तारपूर्वक दिए गए हे ।‘‘
आर्थिक अभावों के चलते आपने हिन्दी काव्य संग्रह अभी तक प्रकाशित नहीं करा पायें हैं किन्तु हिन्दी रचनाओं के पाण्डुलिपि, दोहा संग्रह, कुण्डलियां संग्रह, पांच सात पांच (हाइकू, तांका, चोका संग्रह), नवगीत आदि उपलब्ध हैं ।
आप हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में रचना करते हैं । किन्तु छत्तीसगढ़ी रचनाओं में आपकी विषेष प्रसिद्धि है । आपके मुख्या रूप से कवि ही हैं, किन्तु कविता के साथ-साथ विभन्न विषयों पर आलेख लिखने में भी सिद्धहस्त हैं ।  कुछ कहानियां भी आपके द्वारा दोनों भाषाओं में लिखा जाता रहा है । ऐसे आपका परिचय एक छंदकार के रूप  में होता है ।
आप स्थानिय साहित्य समिति श्रीशमीगणेश साहित्य समिति नवागढ़, जिला-बेमेतरा के अध्यक्ष हैं । वहीं राज्यस्तरीय ‘छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच के संस्थापक संचालक हैं । ‘‘छत्तीसगढ़़ी साहित्य मंच‘ की सहायता से आपने अपने फेसबुक पेज ‘‘छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच‘‘ की सहायता से नवोदित रचनाकारों को कविता के षिल्प विधान से परिचय कराने का सतत प्रयास करते रहे हैं ।  आपने तुकांत कविताओं के अतिरिक्त छंद, मुक्तक, गजल, हाइकू आदि काव्य षिल्प विधान में रचनायें लिखने को प्रेरित करते रहे हैं । आपकी प्रेरणा से कई नव साहित्यकार आज अपने परिचय बनाने में सफल हुये हैं ।
आप का साहित्यिक यात्रा अनवरत जारी है । अभी आप छत्तीसगढ़ी में छंद शास्त्र लिख रहे हैं जिससे छत्तीसगढ़ में छंद का पुनुरोत्थान हो सके और छत्तीसगढ़ी भाषा विष्व पटल पर प्रकाशित हो सके ।
-मनोज श्रीवास्तव
कवि (हास्य व्यंग्य)
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