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होली

बिन पिये माते मन, झुले झुलना के झूल
लाली लाली आगी लागे,फूले परसा फूल।

मन मोर नाचे कुदे, तन घलो झुम उठे
बसंती पवन संग, हासय खुलखुल।

जाड़ सीत लागे नहीं, जनावय नहीं घाम
पानी अब गिरे नहीं, उड़य नहीं धूल।

आनी बानी साग भाजी, माते जैसे खेत बारी
किलो किलो बाढ़ गे हे, बंधी गोभी के फूल।।

होली जब जले संगी, रहें नहीं कोनो तंगी
खिसा घलो रूपिया म, रहिथे फूल-फूल।

रंग-गुलाल उड़य, तन मन संग झुले
करू गोठ आज कोनो, देवय नहीं तूल।

रोटी-पीठा सब चुरे, मुहं म डालत घुरे
ठेठरी सोंहारी संग, भजीया गुलगुल।

सिख इही होली देथे, पापी जम्मो राख होथे
प्रहलाद जलाए के, करय झन भूल।।

सत्यधर बान्धे
गंजपारा बेमेतरा

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